शनिवार, 9 अप्रैल 2016

भाई साहब - गिरीश पंकज

कहानी का कुछ अंश... मेरी बात सुनकर सुनीता उदास चेहरा लिए हँस पड़ी, "ना बाबा ना! ऐसा सोचना भी पाप है। अपनी खुशियों के लिए दूसरे का घर उजाड़ना ठीक नहीं है। भले ही मैं मॉडर्न सोसाइटी में रहती हूँ। लेकिन मुझे अपनी जड़ें पता है। देश छोड़ दिया तो क्या, हमने अपनी संस्कृति तो नहीं छोड़ी है। हमारे परदादा अपने साथ रामचरित मानस लेकर यहाँ आए थे। मैंने उसे पढ़ा तो नहीं है, लेकिन उसकी चर्चा सुनती रहती हूँ। वह कितना ग्रेट एपिक है। मैं इंडिया के बारे में सुनती रहती हूँ। सीता, सावित्री, अनुसूया, द्रौपदी, रानी दुर्गा एक से एक करेक्टर . . .देवियाँ। ऐसे महान देश को याद करती हूँ तो मन करता है इडिया में ही बसूँ। इसीलिए सोचती हूँ कि इंडियन लड़के से मैरिज हो जाए, लेकिन हमारा कल्चर यह नहीं सिखाता कि अपने सुख के लिए दूसरों का घर उजाड़ दो। आपका सुखी जीवन मैं बर्बाद नहीं कर सकती।" "मैंने तो बस यों ही मज़ाक कर दिया था। आपने तो इसे काफ़ी सीरियस ले लिया।" मैंने हँसते हुए कहा, "खैर, विषय बदलते हैं। आप हिंदी फ़िल्में तो ज़रूर देखती होंगी। हिंदी गाने भी खूब सुनती होंगी।" "हाँ, मुझे हिंदी गाने बहुत पसंद है। त्रिनिडाड में सात रेडियो स्टेशन हैं, इनमें से पाँच स्टेशन तो सुबह–शाम हिंदी गाने ही बजाते रहते हैं। एक सिनेमा हॉल में तो अक्सर इंडियन मूवी लगती रहती है।" सुनीता फिर गंभीर हो गई थी। मैं भी बहुत देर तक चुप रहा। समय काफ़ी हो चुका था। पोर्ट ऑॅफ स्पेन जाने वाला ब्रिटिश विमान काँच के पार साफ़–साफ़ दिखाई दे रहा था। एनाउंसमेंट भी शुरू हो चुका था। हमने अपने–अपने बैग उठाए और विमान की तरफ़ बढ़ चले। सुनीता और हमारी सीटें इकॉनामी क्लास में थी। लेकिन अलग–अलग। सुनीता ने मेरे बगल बैठे ब्रिटिश पैसेंजर से आग्रह किया कि वह उसकी सीट में चला जाए तो हम लोग एक साथ यात्रा कर सकेंगे। ब्रिटिश यात्री भला था। वह पता नहीं क्या सोचकर मुस्कुराया और ओक्के, नो प्रॉब्लम बोलकर उठ गया। सुनीता खिड़की के सामने वाली सीट में बैठ गई। और मुस्कुराते हुए बाहर देखने लगी। फिर मुझसे बोली, "खिड़की के पार देखना मुझे बहुत अच्छा लगता है। ये हवाई जहाज़ जब पचपन हज़ार फुट ऊपर उड़ता है, तब तो और मज़ा आता है। खिड़की के बाहर जैसे एक माया लोक बनता है। सागर को देखो। बादलों को देखो, एक अनोखी दुनिया से रू–ब–रू होते चले जाते हैं हम।" मैं समझ रहा था कि सुनीता टॉपिक बदल चुकी है। अब शादी वाली बात छेड़ना ही नहीं चाहती, लेकिन मुझे लग रहा था कि एक बार ज़िक्र छेडूँ। चाची का लड़का है। वह भी अमरीका में पढ़ रहा है। दो–चार साल बाद दिल्ली लौट आएगा। लेकिन बात शुरू करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। पूरी कहानी का आनंद सुनकर लीजिए...

2 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " राजनीति का नेगेटिव - पॉज़िटिव " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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