बुधवार, 13 अप्रैल 2016
कविता - मैं जलियाँवाला बाग हूँ...
दिव्यदृष्टि के श्रव्य संसार में आज हम याद कर रहे हैं, 13 अप्रेल सन 1919 को पंजाब के अमृतसर में हुए दर्दनाक जलियावाला बाग हत्याकांड को। 97 वर्ष जी हां पूरे 97 वें वर्ष गुजर जाने के बाद भी हत्यांकांड के खौफनाक दृश्यों को याद कर हमारी रूह कांप जाती है। भले ही हम इसके साक्षी नहीं हैं लेकिन इतिहास की ये घटना हमारी आंखों में अश्रु और अंगारे दोनों भर देती है। जनरल डायर के एक संकेत मात्र से ही खून की नदियां बह गई थी। चारों ओर चीख, चीत्कार, करूणा, रूदन, आर्तनाद का स्वर गूंज उठा था। हृदय विदारक इस घटना ने विद्रोह के स्वर को और उंचा उठा दिया था। एक आंख में अंगारे और एक आंख में आंसू लिए हम आज भी इस घटना को भूले नहीं हैं। फिर स्वयं वो जलियावाला बाग इस घटना को कैसे भूल सकता है! वह स्वयं अपनी दास्तां बयां कर रहा है। उसकी इस दास्तां को कविता में पिरोया है अरूण सिंह ने.....
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ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के ९७ वीं बरसी - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
जवाब देंहटाएंहमने देखा नहीं पर पढ़ सुनकर महसूस किया है...बहुत बढ़िया दास्तां
जवाब देंहटाएंमर्मस्पर्शी प्रस्तुति ..
जवाब देंहटाएंअमर वीर शहीदों को नमन!