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जो बोले वह खाये दो... कहानी का अंश… दो पण्डे थे। एक था चाचा, दूसरा था भतीजा। एक बार दोनों अपने यजमानों के घर जाने को निकले। एक गाँव गये। वहाँ पहुँचकर यजमान के घर ठहरे। यजमान ने खूब स्वागत-सत्कार किया और दोनों पण्डों से कहा कि वे लड्डू बनाकर खाए। चाचा-भतीजे ने बाटियाँ सेंककर चूरमा तैयार किया। चूरमे के लड्डू बनाये। पाँच लड्डू बने। अब चाचा-भतीजा, दोनों सोचने लगे कि इन्हें बाँटा कैसे जाय? आखिर चाचा-भतीजे ने तय किया कि हम गूँगे बनकर बैठ जाएँ। जो पहले बोले, वह दो खाए, और न बोले, वह तीन खाए। चाचा-भतीजे दोनों बिना बोले, लम्बे फैलकर सो गए। यजमान ने आकर देखा तो न कोई बोलता था, न हिलता-डुलता था। बुलवाने की बहुतेरी कोशिश की, पर कोई जवाब ही नहीं देता था। सब सोचने लगे, ‘कौन जाने, किसी जहरीले जानवर ने इन्हें काट न लिया हो।’ यजमान ने कहा, "आइए, हम सब मिलकर ब्राह्मण के इन बेटों को ठिकाने लगा दें! लोग आपस में बातें कर रहे थे। चाचा-भतीजे लेटे-लेटे सुन रहे थे। दोनों मन-ही-मन सोचने लगे, ‘यह तो गजब हो रहा है। लेकिन बोले कौन? जो बोलेगा, उसे दो ही लड्डू मिलेंगे?’ गाँव के लोग इकट्ठे हो गए, और अरथी तैयार करने लगे। चाचा-भतीजे दोनों को कसकर बाँध दिया गया, पर दोनों में से एक भी नहीं बोला। दोनों ऐसे दम साधे रहे, मानो सचमुच के मुरदे ही हों। लोग रोते-बिलखते उनको श्मशान में ले गये। श्मशान में चिता रची गई, और दोनों को चिता पर रखा गया। दूसरे सबलोग तो नदी पर नहाने चले गए। बस पाँच लोग वहाँ रह गये। बेचारे यजमान ने पूला सुलगाया और रोते-रोते चिता में आग लगाई।

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