शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

मैथिलीशरण गुप्त - पंचवटी - 4

पंचवटी का अंश... यदि बाधाएँ हुईं हमें तो, उन बाधाओं के ही साथ, जिससे बाधा-बोध न हो, वह सहनशक्ति भी आई हाथ। जब बाधाएँ न भी रहेंगी, तब भी शक्ति रहेगी यह, पुर में जाने पर भी वन की, स्मृति अनुरक्ति रहेगी यह॥ नहीं जानती हाय! हमारी, माताएँ आमोद-प्रमोद, मिली हमें है कितनी कोमल, कितनी बड़ी प्रकृति की गोद। इसी खेल को कहते हैं क्या, विद्वज्जन जीवन-संग्राम? तो इसमें सुनाम कर लेना, है कितना साधारण काम! "बेचारी उर्मिला हमारे, लिए व्यर्थ रोती होगी, क्या जाने वह, हम सब वन में, होंगे इतने सुख-भोगी।" मग्न हुए सौमित्रि चित्र-सम, नेत्र निमीलित एक निमेष, फिर आँखें खोलें तो यह क्या, अनुपम रूप, अलौकिक वेश! चकाचौंध-सी लगी देखकर, प्रखर ज्योति की वह ज्वाला, निस्संकोच, खड़ी थी सम्मुख, एक हास्यवदनी बाला! रत्नाभरण भरे अंगो में, ऐसे सुन्दर लगते थे-- ज्यों प्रफुल्ल बल्ली पर सौ सौ, जुगनूँ जगमग जगते थे! इस पूरी कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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