मंगलवार, 26 जुलाई 2016
बौद्ध कला का स्वर्ण शिखर - साँची
बौद्ध कला का स्वर्ण शिखर - साँची। लेख के बारे में...
मैं साँची हूँ. मध्यप्रदेश की राजधानी से केवल एक घंटे दूर. वैभव और ऐश्वर्यशाली है मेरा इतिहास. सम्राट अशोक से नाता है मेरा. प्रकृति मेरे आँगन में खेलती है. मेरे करीब ही गूँजी थी संघमित्रा की हँसी. आज भी मेरा मौन यहाँ की पहाडिय़ों में गूँज रहा है. हर वर्ष लाखों शीश श्रद्धा से झुकते हैं मेरे सामने. गौतम बुद्ध के प्रिय शिष्यों की अमानत है मेरे भीतर. जिसे शताव्दियों से सहेजकर रखा है मैंने. कई विशेषताएँ हैं मेरी. मुझे देखने और सुनने प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु आते हैं और मुझमें समा जाते हैं. वर्षों से मैं मौन हूँ, पर मेरा मौन भीतर की आवाज बनकर सबमें समा रहा है. आप जानना चाहेंगे मुझे! तो आइए...
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से मात्र चालीस किलोमीटर दूर मेरे नाम पर रेल्वे स्टेशन है. यहाँ से एक किलोमीटर दूर पहाड़ी पर है मेरा हृदय. स्टेशन पर उतरते ही मेरा मनोरम दृश्य लोगों को लुभाने लगता है. मेरी पहचान मेरे हृदयरूपी स्तूपों के कारण है. यहाँ के स्तूप भारत देश के अन्य स्तूपों की अपेक्षा अधिक सुरक्षित और पूर्ण हैं. जानना चाहते हैं इन स्तूपों को? तो देखो सुबह की पहली किरण के साथ... ये ऐसे लगते हैं. देखा! कैसा लगा, सच मानों इन क्षणों में पूरी प्रकृति ही मुझमें समा जाती है. इन स्तूपों में ईस्वी पूर्व तीसरी शताव्दी से ईस्वी बारहवीं शताव्दी तक की बौद्ध वास्तु एवं शिल्पकला के प्रादुर्भाव, विकास और अवनति का पूरा परिचय मिलता है. इन पंद्रह शताव्दियों में भारत के बौद्ध धर्म का संपूर्ण इतिहास छिपा है. इतना कुछ होने पर भी इस बात पर इतिहास मौन है कि बौद्धों ने मुझ पर इतनी कृपादृष्टि क्यों की? गौतम बुद्ध की किलकारी न तो मेरे आँगन में गूँजी थी और न ही कभी मेरे जीवन को उनके ललाट की लालिमा ने आलोकित किया. इसके अलावा न तो मेरे आँगन में कभी बौद्धों का कोई महासम्मेलन हुआ न ही कोई ऐसी महत्वपूर्ण घटना की ही मैं साक्षी हूँ. फिर भी उनकी स्मृतियाँ मेरे मानस पटल पर छाई हुई हैं. यहाँ तक कि चीनी यात्री ह्वेनसांग भी अपने संस्मरणों में मेरा जिक्र नहीं किया है.
अब आप मुझसे पूछेंगे कि आखिर मेरी प्रसिद्धि इतनी क्यों है? तो मैं बता दूँ कि मेरी प्रसिद्धि का कारण ये स्तूप, संधागार, मंदिर और स्तंभ हैं. आओ अब मैं बता दूँ अपने आँगन के सबसे बेशकीमती हीरे के बारे में. ये देखो स्तूप क्रमांक एक.. यही है वह मेरे आँगन का अमोल हीरा. जिसे अब तक विश्व के लाखों लोगों ने निहारा है. आप भी निहार सकते हैं, पर निहारने से क्या होगा. इसके बारे में कुछ मालूम तो होना ही चाहिए ना.
इस पूरे लेख का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
लेबल:
दिव्य दृष्टि,
लेख

सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
Post Labels
- अतीत के झरोखे से
- अपनी खबर
- अभिमत
- आज का सच
- आलेख
- उपलब्धि
- कथा
- कविता
- कहानी
- गजल
- ग़ज़ल
- गीत
- चिंतन
- जिंदगी
- तिलक हॊली मनाएँ
- दिव्य दृष्टि
- दिव्य दृष्टि - कविता
- दिव्य दृष्टि - बाल रामकथा
- दीप पर्व
- दृष्टिकोण
- दोहे
- नाटक
- निबंध
- पर्यावरण
- प्रकृति
- प्रबंधन
- प्रेरक कथा
- प्रेरक कहानी
- प्रेरक प्रसंग
- फिल्म संसार
- फिल्मी गीत
- फीचर
- बच्चों का कोना
- बाल कहानी
- बाल कविता
- बाल कविताएँ
- बाल कहानी
- बालकविता
- भाषा की बात
- मानवता
- यात्रा वृतांत
- यात्रा संस्मरण
- रेडियो रूपक
- लघु कथा
- लघुकथा
- ललित निबंध
- लेख
- लोक कथा
- विज्ञान
- व्यंग्य
- व्यक्तित्व
- शब्द-यात्रा'
- श्रद्धांजलि
- संस्कृति
- सफलता का मार्ग
- साक्षात्कार
- सामयिक मुस्कान
- सिनेमा
- सियासत
- स्वास्थ्य
- हमारी भाषा
- हास्य व्यंग्य
- हिंदी दिवस विशेष
- हिंदी विशेष
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें