शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

मैथिलीशरण गुप्त - पंचवटी - 2

पंचवटी का अंश... सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है, अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है! अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है, पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥ तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात, वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात। अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की। किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की! और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे, व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे। कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक; पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक! मझली माँ ने क्या समझा था, कि मैं राजमाता हूँगी, निर्वासित कर आर्य राम को, अपनी जड़ें जमा लूँगी। चित्रकूट में किन्तु उसे ही, देख स्वयं करुणा थकती, उसे देखते थे सब, वह थी, निज को ही न देख सकती॥ इस पूरी कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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