बुधवार, 20 जुलाई 2016

कविताएँ - गोपाल सिंह नेपाली

यह दिया बुझे नहीं... कविता का अंश... घोर अंधकार हो, चल रही बयार हो, आज द्वार-द्वार पर यह दिया बुझे नहीं यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है। शक्ति का दिया हुआ, शक्ति को दिया हुआ, भक्ति से दिया हुआ, यह स्वतंत्रता-दिया, रुक रही न नाव हो जोर का बहाव हो, आज गंग-धार पर यह दिया बुझे नहीं, यह स्वदेश का दिया प्राण के समान है। यह अतीत कल्पना, यह विनीत प्रार्थना, यह पुनीत भावना, यह अनंत साधना, शांति हो, अशांति हो, युद्ध, संधि, क्रांति हो, तीर पर, कछार पर, यह दिया बुझे नहीं, देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है। इस अधूरी कविता के साथ ही अन्य कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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