शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

मैथिलीशरण गुप्त - पंचवटी - 12

पंचवटी का अंश... पक्षपातमय सानुरोध है, जितना अटल प्रेम का बोध, उतना ही बलवत्तर समझो, कामिनियों का वैर-विरोध। होता है विरोध से भी कुछ, अधिक कराल हमारा क्रोध, और, क्रोध से भी विशेष है, द्वेष-पूर्ण अपना प्रतिशोध॥ देख क्यों न लो तुम, मैं जितनी सुन्दर हूँ उतनी ही घोर, दीख रही हूँ जितनी कोमल, हूँ उतनी ही कठिन-कठोर!" सचमुच विस्मयपूर्वक सबने, देखा निज समक्ष तत्काल- वह अति रम्य रूप पल भर में, सहसा बना विकट-कराल! सबने मृदु मारुत का दारुण, झंझा नर्तन देखा था, सन्ध्या के उपरान्त तमी का, विकृतावर्तन देखा था! काल-कीट-कृत वयस-कुसुम-का, क्रम से कर्तन देखा था! किन्तु किसी ने अकस्मात् कब, यह परिवर्तन देखा था! गोल कपोल पलटकर सहसा, बने भिड़ों के छत्तों-से, हिलने लगे उष्ण साँसों में, ओंठ लपालप-लत्तों से! कुन्दकली-से दाँत हो गये, बढ़ बारह की डाढ़ों से, विकृत, भयानक और रौद्र रस, प्रगटे पूरी बाढ़ों-से? जहाँ लाल साड़ी थी तनु में, बना चर्म का चीर वहाँ, हुए अस्थियों के आभूषण, थे मणिमुक्ता-हीर जहाँ! कन्धों पर के बड़े बाल वे, बने अहो! आँतों के जाल, फूलों की वह वरमाला भी, हुई मुण्डमाला सुविशाल! इस पूरी कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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