शुक्रवार, 22 जुलाई 2016
मैथिलीशरण गुप्त - पंचवटी - 5
पंचवटी का अंश... पर मैं ही यदि परनारी से, पहले संभाषण करता,
तो छिन जाती आज कदाचित् पुरुषों की सुधर्मपरता।
जो हो, पर मेरे बारे में, बात तुम्हारी सच्ची है,
चण्डि, क्या कहूँ, तुमसे, मेरी, ममता कितनी कच्ची है॥
माता, पिता और पत्नी की, धन की, धरा-धाम की भी,
मुझे न कुछ भी ममता व्यापी, जीवन परम्परा की भी,
एक-किन्तु उन बातों से क्या, फिर भी हूँ मैं परम सुखी,
ममता तो महिलाओं में ही, होती है हे मंजुमुखी॥
शूरवीर कहकर भी मुझको, तुम जो भीरु बताती हो,
इससे सूक्ष्मदर्शिता ही तुम, अपनी मुझे जताती हो?
भाषण-भंगी देख तुम्हारी, हाँ, मुझको भय होता है,
प्रमदे, तुम्हें देख वन में यों, मन में संशय होता है॥
कहूँ मानवी यदि मैं तुमको, तो वैसा संकोच कहाँ?
कहूँ दानवी तो उसमें है, यह लावण्य कि लोच कहाँ?
वनदेवी समझूँ तो वह तो, होती है भोली-भाली,
तुम्हीं बताओ कि तुम कौन हो, हे रंजित रहस्यवाली?"
इस पूरी कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
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