रविवार, 24 जुलाई 2016
कविता - याज्ञसेनी - 2 - राजेश्वर वशिष्ठ
कविता का अंश...याज्ञसेनी, हाँ द्रौपदी हूँ, मैं !
स्त्रियों के जन्म तो होते रहे हैं
स्त्रियाँ ही जन्म देती हैं उन्हें भी
सृष्टि ऐसे ही चली है युग-युगों से !
स्त्रियाँ ही राजमाताएँ,
रानियाँ पट-रानियाँ भी
और वे ही नगर-वधुएँ
एक चुप्पी-सी झलकती है
हमारे धर्म में,
चिन्तन-व्यवस्था में
न्याय क्यों नारी विमुख-सा ही रहा है ?
नलयानी मेरा नाम था
पिछले जन्म में
निषाद कुल सम्राट,
नल थे पिता मेरे
द्यूत-प्रेमी,
जो जंगलों में वनवास जीते थे
और मेरी माँ अलौकिक सुंदरी थी,
श्वेतवर्णा -- नाम दमयन्ती,
देख कर उसको
इन्द्र की भी अप्सराएँ मुँह छुपाती थीं
शुचिता से भरी वह श्रेष्ठता से पूर्ण थी
त्याग की प्रतिमूर्ति थी वह !
नलयानी सुन्दर थी, मुखर थी
माप लेना चाहती थी -- हंसिनी-सी
प्रेम का उत्ताल सागर,
अधखिली-सी कुमुदिनी थी।
इस पूरी कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...
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कविता,
दिव्य दृष्टि

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