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12:22 pm
कविता का अंश...चलते-चलते थक गए पैर फिर भी चलता जाता हूँ! पीते-पीते मुँद गए नयन फिर भी पीता जाता हूँ! झुलसाया जग ने यह जीवन इतना कि राख भी जलती है, रह गई साँस है एक सिर्फ वह भी तो आज मचलती है, क्या ऐसा भी जलना देखा- जलना न चाहता हूँ लेकिन फिर भी जलता जाता हूँ! चलते-चलते थक गए पैर फिर भी चलता जाता हूँ! बसने से पहले लुटता है दीवानों का संसार सुघर, खुद की समाधि पर दीपक बन जलता प्राणों का प्यार मधुर, कैसे संसार बसे मेरा- हूँ कर से बना रहा लेकिन पग से ढाता जात हूँ! चलते-चलते थक गए पैर फिर भी चलता जाता हूँ! इस अधूरी कविता को पूरा सुनिए ऑडियो के माध्यम से...

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