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कहानी का अंश... सीतापुर का निवासी दुर्वास उस गाँव का संपन्न सेठ था। उसके पुरखों ने उसके लिए काफी जायदाद छोड़ रखी थी। उसका अपना एक महल था। पच्चीस एकड़ का उपजाऊ खेत था और पचास एकड़ का खुश्क भूमि का वह मालिक था। एक बहुत बड़े आम के बगीचे का भी वह मालिक था। इस वजह से गाँव के लोग उसका आदर करते थे। उसका असली नाम तो रामचंद्र था, पर उसकी तुनकमिजाजी के कारण सभी लोग उसे दुर्वास कहकर बुलाते थे। वह भी उनकी बातों का बुरा इसलिए नहीं मानता था कि उसे दुर्वास एक खिताब की तरह लगता था। इसलिए उसने कभी भी इस नाम का विरोध नहीं किया। किसी पर नाराज हो जाए, तो जो मुँह में आए वही कह देता था। दुर्वास के तीन बच्चे थे। दो बेटियों की तो उसने शादी कर दी थी और एक बेटा था। बेटे किरीट को अपने पिता का यह स्वभाव बिलकुल पसंद नहीं था। इसी डर से वह शादी करने से भी हिचकता था। मन ही मन सोचता था कि उसके पिता के ऐसे स्वभाव के कारण उसकी पत्नी की उनसे कैसे निभेगी?पर पिता के कहने पर उसे शादी करनी ही पड़ी। आगे क्या हुआ, यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

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