अतीत के झरोखे से अपनी खबर अभिमत आज का सच आलेख उपलब्धि कथा कविता कहानी गजल ग़ज़ल गीत चिंतन जिंदगी तिलक हॊली मनाएँ दिव्य दृष्टि दीप पर्व दृष्टिकोण दोहे नाटक निबंध पर्यावरण प्रकृति प्रबंधन प्रेरक कथा प्रेरक कहानी प्रेरक प्रसंग फिल्‍म संसार फिल्‍मी गीत फीचर बच्चों का कोना बाल कहानी बाल कविता बाल कविताएँ बाल कहानी बालकविता मानवता यात्रा वृतांत यात्रा संस्मरण लघु कथा लघुकथा ललित निबंध लेख लोक कथा विज्ञान व्यंग्य व्‍यक्तित्‍व शब्द-यात्रा' श्रद्धांजलि सफलता का मार्ग साक्षात्कार सामयिक मुस्‍कान सिनेमा सियासत स्वास्थ्य हमारी भाषा हास्‍य व्‍यंग्‍य हिंदी दिवस विशेष हिंदी विशेष

8:34 pm
लेख का अंश… अहिल्याबाई एक अद्वितीय वीरांगना थीं। जब वह युद्ध क्षेत्र में उतरती थी, तो अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देती थी। सिंहनी के समान उनकी दहाड़ थी। दुर्गा की शक्तिवाहिनी तलवार उनके हाथ में रहती थी। वीरता के साथ-साथ बुद्धिमता अहिल्या एक कुशल प्रशासक भी थीं। प्रजा को न्याय दिलाने के लिए हमेशा संघर्ष करती रहीं। मध्यप्रदेश ऐसी वीरांगना को पाकर गौरवान्वित अनुभव करता है। इन्दौर को अहिल्या नगरी के नाम से भी जाना जाता है। रणबांकुरों की भूमि औरंगाबाद महाराष्ट्र के चौड़ी नामक गाँव में अहिल्या बाई का जन्म सत्रह मई 1725 को मानकोजी शिंदे के घर हुआ था। उस रूढ़िवादिता के दौर में जब बालिकाओं के लिए शिक्षा स्वप्न की बात थी, तब मानकोजी शिंदे ने अपनी बेटी अहिल्या की शिक्षा पर विशेष बल दिया। अहिल्या लगनशील थीं। विद्यार्थी जीवन में ही अपनी प्रतिभा का परिचय उन्होंने दे दिया था। आठ वर्ष की छोटी उम्र में ही उनका विवाह इन्दौर रियासत के प्रथम शासक मल्हार राव होलकर के पुत्र खांडेराव होलकर के साथ कर दिया गया। अहिल्याबाई को अधिक दिनों तक दांपत्य सुख प्राप्त नहीं हो पाया। भरतपुर के पास किलेर के किले के संघर्ष में अहिल्याबाई के पति खांडेराव होलकर का निधन हो गया। राज्य के एकमात्र उत्तराधिकारी की इस तरह मृत्यु हो जाने पर मल्हार राव को बड़ा आधात लगा। अहिल्याबाई उनके साथ सती होना चाहती थी, किन्तु मल्हार राव ने उन्हें रोक लिया। उन्हें अपनी पुत्रवधू की बुद्धिमता और कुशलता पर पूर्ण विश्वास था। इस अधूरे लेख को पूरा सुनने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…

एक टिप्पणी भेजें

Author Name

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.