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कहानी का अंश… एक फलदार पेड़ था। उसके नीचे फलों के बहुत-से बीज बिखरे पड़े थे। हवा का एक जोरदार झौंका आया, एक बीज हवा के साथ उड़कर बहुत ऊंचाई पर पहुँच गया। चलते-चलते हवा ने बीज से पूछा – बता, मैं तुझे धरती पर कहाँ गिराऊँ? गाँव में, नगर में या फिर जंगल में? बीज बोला – गाँव में बहुत सारे पेड़-पौधे होते हैं। नगर में भी बाग-बगीचों की कमी नहीं और जंगल तो हजारों पेड़-पौधों से भरा होता है। इसलिए इन स्थानों पर जाने की मेरी कोई इच्छा नहीं है। हवा, तुम मुझे ऐसे उजाड़ रास्ते पर गिरा दे, जहाँ कोई पेड़ न हो, न कोई पौधा। जहाँ न छाया हो और न किसी के आराम के लिए कोई ठंडी जगह हो। बस, मैं ऐसे ही स्थान पर उगना चाहता हूँ। फिर क्या था, हवा ने उस बीज को एक ऐसे ही उजाड़ स्थान पर रास्ते के किनारे गिरा दिया। मिट्टी में कुछ दिनों तक पड़े रहने के बाद वह बीज सचमुच उग आया और सुबह जब पूर्व दिशा से लाल सूरज की किरणें उस पर पड़ी तो उसकी नन्हीं-नन्हीं कोंपलें भी चमकने लगी। तभी उधर से एक वासन्ती हवा गुजरी। सुनहरे पौधे को देखकर हवा का मन उसके साथ खेलने का हुआ। हवा ने उससे पूछा – पौधे, पौधे क्या मैं तुम्हारे साथ खेल सकती हूँ? पौधा बोला – मेरे ये सुनहरे पत्ते यहाँ और किस काम आएँगे। मेरी इस कोमल शाखा से इस उजाड़ स्थान पर और क्या लाभ हो सकता है? यह मेरा बड़ा सौभाग्य होगा कि मेरे साथ खेलकर तुम्हें थोड़ी देर के लिए खुशी मिलेगी। मुझे कोई ऐतराज नहीं है। तुम मेरे साथ खेलो। यह सुनकर वह वासन्ती हवा उस सुनहरे पौधे के साथ थोड़ी देर तक खेली और फिर वहाँ से चली गई। पौधा धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। अब वह बढ़ते-बढ़ते एक वृक्ष बन गया। उस पर बहुत-सी शाखाएँ उग आईं। उन शाखाओं पर पत्ते लगे और वह वृक्ष उन पत्तों से ढँक गया। इस तरह वह एक घना वृक्ष बन गया। आगे क्या हुआ, यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए….

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