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गुजराती साहित्य में गीजुभाई बधेका का नाम एक जान-पहचाना नाम है। उनकी लिखी बाल कहानियाँ आज भी लोगों काे जुबानी याद हैं। इन गुजराती कहानियों का हिंदी अनुवाद काशीनाथ त्रिवेदी जी ने किया है। यहाँ प्रस्तुत है उनकी बाल कहानियों में से एक कहानी सात पूँछोंवाला चूहा... कहानी का अंश... एक था चूहा। उसकी सात पूँछें थीं। एक दिन उसकी माँ ने उसे पाठशाला में पढ़ने भेजा। वहाँ चूहे की सात पूँछें देखकर लड़के उसे चिढ़ाने लगे: सात पूँछों वाला चूहा, सात पूँछों वाला चूहा, सात पूँछों वाला। चूहा रोता-रोता घर पहुंचा। मां ने पूछा, "क्यों रो रहे हो? पाठशाला से लौट क्यों आये?" चूहा बोला, "एं, एं एं! सब मुझे ‘सात पूँछों वाला चूहा’, ‘सात पूँछों वाला’ कहकर चिढ़ाते हैं। मां ने कहा, "जाओ, एक पूँछ कटवा आओ। बढ़ई के घर चले जाओ।" चूहा बढ़ई के घर पहुँचा, और एक पूँछ कटवाकर लौटा। अब छह पूँछ रह गईं। दूसरे दिन जब वह पाठशाला में गया, तो लड़के उसे फिर चिढ़ाने लगे: छह पूँछों वाला चूहा, छह पूँछों वाला। छह पूँछों वाला चूहा, छह पूँछों वाला। चूहा ‘ऊं, ऊं, ऊं," करता हुआ फिर घर पहुँचा, और रूठकर चक्की के नीचे जा बैठा। उसकी माँ ने कहा, "यह चूहा कहाँ चला गया? अरे, खाना तो खा लो। भूख नहीं लगी क्या?" चूहा बोला, "मैं नहीं खाऊँगा। सब मुझे ‘छह पूँछों वाला चूहा’, छह पूँछों वाला’ कहकर चिढ़ाते हैं।" मां ने कहा, "जा, फिर बढ़ई के घर जाकर एक पूँछ कटवा आ।" चूहा बढ़ई के घर पहुंचा, और एक पूँछ और कटवा आया। अब उसकी पाँच पूँछ रह गई। दूसरे दिन वह पाठशाला गया। चूहे को आता देखकर सब लड़के एक-साथ बोले, "वह देखो, चूहे भैया चले आ रहे हैं!" चूहे की पांच पूँछ देखकर लड़के फिर उसे चिढ़ाने लगे: पाँच पूँछों वाला चूहा, पाँच पूँछों वाला। पाँच पूँछों वाला चूहा, पाँच पूँछों वाला। चूहा चिढ़ गया औ जोर-जोर से रोता-रोता घर पहुँचा। वहाँ एक पेटी पर जा बैठा। चूहे की माँ ने पूछा, "तुझे अब क्या हो गया? ज़ोर-ज़ोर से क्यों रो रहा है?" आगे की कहानी ऑडियो की मदद से सुनिए...

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