शुक्रवार, 1 जुलाई 2016
पंचतंत्र की कहानियाँ - 25 - मूर्ख बातूनी कछुआ
कहानी का अंश... एक तालाब में एक कछुआ रहता था। उसी तलाब में दो हंस तैरने के लिए उतरते थे। हंस बहुत हँसमुख और मिलनसार थे। कछुए और उनमें दोस्ती होते देर न लगी। हंसों को कछुए का धीमे-धीमे चलना और उसका भोलापन बहुत अच्छा लगा। हंस बहुत ज्ञानी भी थे। वे कछुए को अदभुत बातें बताते। ॠषि-मुनियों की कहानियाँ सुनाते। हंस तो दूर-दूर तक घूमकर आते थे, इसलिए दूसरी जगहों की अनोखी बातें कछुए को बताते। कछुआ मंत्रमुग्ध होकर उनकी बातें सुनता। बाकी तो सब ठीक था, पर कछुए को बीच में टोका-टाकी करने की बहुत आदत थी। अपने सज्जन स्वभाव के कारण हंस उसकी इस आदत का बुरा नहीं मानते थे। उन तीनों की घनिष्टता बढती गई। दिन गुजरते गए।
एक बार बडे ज़ोर का सूखा पडा। बरसात के मौसम में भी एक बूँद पानी नहीं बरसा। उस तालाब का पानी सूखने लगा। प्राणी मरने लगे, मछलियाँ तो तडप-तडपकर मर गईं। तालाब का पानी और तेजी से सूखने लगा। एक समय ऐसा भी आया कि तालाब में ख़ाली कीचड रह गया। कछुआ बडे संकट में पड गया। जीवन-मरण का प्रश्न खडा हो गया। वहीं पडा रहता तो कछुए का अंत निश्चित था। हंस अपने मित्र पर आए संकट को दूर करने का उपाय सोचने लगे। वे अपने मित्र कछुए को ढाडस बँधाने का प्रयत्न करते और हिम्म्त न हारने की सलाह देते। हंस केवल झूठा दिलासा नहीं दे रहे थे। वे दूर-दूर तक उडकर समस्या का हल ढूढते। एक दिन लौटकर हंसों ने कहा 'मित्र, यहाँ से पचास कोस दूर एक झील हैं। उसमें काफ़ी पानी हैं तुम वहाँ मजे से रहोगे।' कछुआ रोनी आवाज़ में बोला 'पचास कोस? इतनी दूर जाने में मुझे महीनों लगेंगे। तब तक तो मैं मर जाऊँगा।'
कछुए की बात भी ठीक थी। हंसों ने अक़्ल लडाई और एक तरीका सोच निकाला। आखिर हंसों ने क्या तरीका खोजा कि जिससे उनके मित्र कछुए की जान बच गई? ये जानने के लिए सुनिए बाल कहानी - मूर्ख बातूनी कछुआ, ऑडियो की मदद से...
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