मंगलवार, 20 सितंबर 2016

कहानी – मुर्दों का गाँव –धर्मवीर भारती

कहानी का अंश.... उस गाँव के बारे में अजीब अफवाहें फैली थीं। लोग कहते थे कि वहाँ दिन में भी मौत का एक काला साया रोशनी पर पड़ा रहता है। शाम होते ही कब्रें जम्हाइयाँ लेने लगती हैं और भूखे कंकाल अँधेरे का लबादा ओढ़कर सड़कों, पगडंडियों और खेतों की मेड़ों पर खाने की तलाश में घूमा करते हैं। उनके ढीले पंजरों की खड़खड़ाहट सुनकर लाशों के चारों ओर चिल्लाने वाले घिनौने सियार सहमकर चुप हो जाते हैं और गोश्तखो गिद्धों के बच्चे डैनों में सिर ढाँपकर सूखे ठूँठों की कोटरों में छिप जाते हैं। और इसी से जब अखिल ने कहा कि चलो उस गाँव के आँकड़े भी तैयार कर लें, तो मैं एक बार काँप गया। बहुत मुश्किल से पास के गाँव का एक लड़का साथ जाने को तैयार हुआ। सामने दो मील की दूरी पर पेड़ों की झुरमुटों में उस गाँव की झलक दिखाई दी। मील भर पहले से ही खेतों में लाशें मिलने लगीं। गाँव के नजदीक पहुँचते-पहुँचते तो यह हाल हो गया कि मालूम पड़ता था भूख ने इस गाँव के चारों ओर मौत के बीज बोए थे और आज सड़ी लाशों की फसल लहलहा रही है। कुत्ते, गिद्ध, सियार और कौवे उस फसल का पूरा फायदा उठा रहे हैं। इतने में हवा का एक तेज झौंका आया और बदबू से हमारा सिर घूम गया। मगर फिर जैसे उस दुर्गंध से लदकर हवा के भारी और अधमरे झौंके सूखे बाँसों के झुरमुटों में अटककर रूक गए। और सामने मुर्दो के गाँव का पहला झोंपड़ा दिख पड़ा। तीन और दीवारें गिर गई थीं और एक ओर की दीवार के सहारे आधा छप्पर लटक रहा था। दीवार की आड़ में एक कंकाल पड़ा था... आगे की कहानी जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए....

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