सोमवार, 5 सितंबर 2016
बाल कविता - छुक छुक गाड़ी….
कविता का अंश…
छुक छुक छुक छुक करती छुक छुक गाड़ी चली,
सबसे आगे काला हाथी, इंजन वह कहलाता।
हाथी पर बैठा खरगोश, ड्राइवर वह कहलाता,
बड़े –बड़े फल वो हाथी को देता जाता।
जंगल में मचता कोलाहल पक्षी घबरा जाते,
लंबी गरदनवाले जिराफ भाई जंगल देखते जाते,
भेड़िया और सियार उसके पाँव से टकराए।
काना कौआ एक आँख से जंगल देखता जाए,
हिरन और साँभर कुलाँचे मारते जाए।
कोट पहनकर बंदर भाई डिब्बे-डिब्बे जाए,
सबकी टिकट जाँच कर टी.टी.ई. वो कहलाए।
सबसे पीछे झंडी लेकर रीछ भाई जाए,
पीप पीप पीप पीप सीटी बजाए, गाड़ी चलती जाए।
इस कविता का पूरा आनंद लेने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…
लेबल:
दिव्य दृष्टि,
बाल कविता

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