शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

कविताएँ - अनंत आलोक

कविता का अंश... कल रात भर, मैं तन्‍हा ही भटकता रहा, यादों के बियाबान जंगल में। जंगल भरा पड़ा था, खट्‌टी मीठी और कड़वी, यादों के पेड़-पौधों से। जंगल के बीचोंबीच उग आए थे, कुछ मीठे अनुभवों के विशालकाय दरख़्त। जो लदे पड़े थे, मधुर एहसासों के फूलों-फलों से। बीच-बीच में उग आई थी, कड़़वे प्रसंगों की तीखी काँटेदार झाड़ियाँ। जिनके पास से गुज़रने पर, आज भी ताज़ा हो जाती है वो चुभन, और उछल पड़ता है दिल। मेरे एकदम सामने बैठी, जुगनुओं जड़ी चादर ओढ़े, मनमोहक, साँवली-सलोनी निशा, नींद की बोतल से भर भर, नैन कटोरे, पिलाती रही मुझे, रात रस। लेकिन मैं बहका नहीं, बढ़ता ही गया आगे, और आगे... इस अधूरी कविता के साथ अन्य कविता का पूरा आनंद लेने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए...

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