गुरुवार, 8 सितंबर 2016

कविता - समय - कुलदीप कुमार

समय... कविता का अंश... समय नहीं मिलता इन दिनों। मेरे पास हर बात का, बस एक ही जव़ाब है- समय नहीं मिलता। समय नाम की यह जिंस, आखिर क्यों नहीं मिलती ? क्या इसकी भी कालाबाजारी, शुरू हो गयी है? क्या तिजारतियों ने इसे, अपने गोदामों में भर लिया है ? क्या इसीलिए कुछ लोगों के पास, समय ही समय है? और कुछ के पास, बिलकुल भी नहीं ? मैं पूछता रहता हूँ ऐसे ही सवाल, समय-असमय। और पाता हूँ, कि समय हर किसी के पास है। उनके भी जिन्हें हर समय पता रहता है कि उनके पास वह है। और उनके पास भी, जिन्हें हर क्षण यह अहसास होता रहता है, कि उनके पास वह नहीं है। सभी के पास समय है, और सभी का समय, अलग-अलग है। यूँ यह बात दीगर है, कि समय किसी का भी नहीं होता। पुराने लोग कहा करते थे - हर बात के होने का एक समय होता है। इसलिए हर बात को, उसके समय पर ही होना चाहिए... इस अधूरी कविता का पूरा आनंद लेने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए.... संपर्क - kuldeep.kumar55@gmail.com

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