शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

लघु कथा – पहला वेतन – डॉ. मिथिलेश दीक्षित

कथा का अंश… जमुना फूली नहीं समा रही थी। उसकी बरसों की तपस्या सफल हो गई थी। उसकी बिटिया मयूरी की नौकरी लग गई थी। पति की आकस्मिक मृत्यु के बाद उसने मयूरी का पालन-पोषण और उसकी शिक्षा-दीक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थी वह। एक-दो घरों में खाना बनाकर उसने मयूरी की इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कराई। मयूरी ने भी बड़ी मेहनत से पढ़ाई की थी। उसे एक अच्छी कंपनी में जगह मिल गई, तो जमुना रोज नए-नए सपने सजाने लगी… जब पहला वेतन मिलेगा, तो उसकी बिटिया उसके हाथ में रखकर कहेगी – अम्मा, यह सैलेरी तुम्हें समर्पित। तुम्हारी तपस्या, मेहनत और प्रेरणा का ही यह सुफल है। अम्मा, तुम्हारी सबसे बड़ी इच्छा आज पूरी हुई है। मुझे आशीष दो अम्मा कि मेरे इस नए जीवन की शुरूआत तुम्हारे आशीर्वाद से हो। कभी वह सोचती… जब पहला वेतन मिलेगा तो मयूरी मेरे लिए अच्छी-अच्छी साडि़याँ लेकर आएगी … और कहेगी अम्मा, बहुत कर ली तुमने मेहनत। अब तुम्हें काम करने की जरूरत नहीं है। तुम आराम से रहो। अब मैं काम करूँगी और तुम आराम करना। अरे हाँ, इस महीने मेरा जन्मदिन भी तो है। हो सकता है, तब तक मयूरी को वेतन मिल जाए। हमेशा शब्दों से बधाई देने वाली बिटिया मेरे लिए ढेरों मिठाई लेकर आएगी और कहेगी, अम्मा, झटपट मंदिर चलो। तुम्हारी पसंद के बूँदी के लड्डू का प्रसाद चढ़ाऊँगी और अपनी अम्मा को अपने हाथों से खिलाऊँगी….। और फिर वह दिन भी आ गया जिसकी जमुना को प्रतीक्षा थी। आज मयूरी को पहला वेतन मिलने वाला था… आगे क्या हुआ? यह जानने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए….

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