मंगलवार, 27 सितंबर 2016

कुछ ग़ज़लें – 1 – विमल कुमार शर्मा

दिव्य दृष्टि के श्रव्य संसार में मुलाकात करते हैं विमल कुमार शर्मा की ग़ज़लों से। विमल कुमार शर्मा को शायरी का माहौल विरासत में मिला। पिताजी के दिलो-दिमाग में रची-बसी शायरी, गीत, ग़ज़ल उनकी रग-रग में बचपन से ही बस गई। भले ही नादान बचपन उनके अर्थ से अनजान था मगर शायरी सुनना और गुनगुनाना अच्छा लगता था। धीरे-धीरे समय के साथ समझ बढ़ी और खुद की शायरी बनने लगी। स्कूल से लेकर कॉलेज तक का सफर आगरा में ही हुआ। ऐतिहासिक शहर में रहने का फायदा यह हुआ कि मुशायरों का लुत्फ भी उठाया गया और बचपन की शायरी वर्तमान की दहलीज पर आकर उन्हें एक नई पहचान दे गई। गीत, ग़ज़ल, शायरी, व्यंग्य, कविता, कहानी, मुक्तक सारी विधाओं में हस्तक्षेप रखने वाले विमल कुमार शर्मा पेशे से फोरेन्सिक विशेषज्ञ हैं, इस बात पर यकीन करने को मन नहीं करता। किंतु समय का हर क्षण साक्षी है कि पर्याय इंसान को जितनी पहचान देते हैं, उससे कहीं अधिक पहचान उसे विलोम देते हैँ अत: इस बात पर भी यकीन करना ही है कि अपनी कर्मभूमि में कँटीली राह के राही श्री विमल जी रचनात्मक माटी में सृजन संसार के कई कोमल अंकुर बोने में पूर्णत: समर्थ हैं। ग़ज़ल… कहते हैं लोग मुझसे मैं हूँ आइना तेरा, मुझमें तू कैसी दिखती है, इतना तो बता दे। तू भी तो जानती है कि तू जान है मेरी, फिर जिस्म से जुदा है क्यों, इतना तो बता दे। चंचल मन के पास तू रहती है दिन-रात प्रिये, कब दिल के पास आएगी, इतना तो बता दे। मुद्दत से तेरा इंतजार मुझको है सनम, ये खत्म भी होगा कभी, इतना तो बता दे। जितने थे स्वप्न तूने सब मुझको दे दिये, दिल कब मुझे तू देगी, इतना तो बता दे। ऐसी ही अन्य ग़ज़लों का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए… संपर्क - ई-मेल : vimalsharma31@gmail.com

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