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3:40 pm
कविता का अंश… औरत, मोहल्ले से घरों तक, लोहा तोड़ती, पेड़ के नीचे, सोती-जागती, खानाबदोश है औरत। जंगलों-पहाड़ों-पर्वतों, सुरंगों-नालों, चौराहों-गलियारों में, पत्थर तोड़ती, झूले को धक्का देती, आँचल में दुनिया उतारती, नक्शे पर सड़क बनाती, भटकों को राह दिखाती, तीर है औरत। ढकी-उघड़ी, नंगी-अधनंगी, डर-सहमी, बड़ी कंपनी का, सस्ता माल बेचती, इश्तहार है औरत। भागती जिंदगी की दौड़ में, सरकारी परिवहन में, सैर करते, पेड़-पौधों के बीच, सूख गए ठूँठ-सी, उखाड़ने योग्य है औरत। औरत… इस अधूरी कविता का पूरा आनंद लेने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए… संपर्क - sharmarenu61@gmail.com

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