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बदल गए हैं गाँव... कविता का अंश... सिमटे स्नेह टूटते रिश्ते कितने बदल गए हैं गाँव! परदेशी की बाट जोहती आँखें अब हो गई कहानी, कोयल-मोर-पपीहे की वह टेर कहीं खो गई सुहानी, अब मुड़ेर से नहीं सुनाई देता है कौवे का काँव। वे रिश्तोंवाले संबोधन भी देते हैं नहीं सुनाई, भाईचारा-प्यार-मोहब्बतवाली बातें हुईं पराई, मधुर स्नेह-संबंधों में कब जाने कौन अड़ा दे पाँव। सूखे ताल-तलैया-पोखर पनघट पर छाई वीरानी, सूनी पड़ी हुई चौपालें अब अलाव की बात पुरानी, कहाँ गईं छितवन की छाँहें, उस बूढ़े बरगद की छाँव। रिश्ते-नातों की बातों पर हो जाती फीकी मुस्कानें, बात-बात पर पड़ जाते हैं पीछे लोग मुट्ठियाँ ताने, कहाँ बटोही करे बसेरा कोई नहीं ठिकाना-ठाँव। चले गए जो शहर गाँव की यादें उनको नहीं सतातीं, घरवाले रो-रोकर चाहे लिखवाए पाती पर पाती, भूल गए ममता का आँचल दादा जी के दुखते पाँव। इस अधूरी कविता के साथ ही ऐसी ही अन्य भावपूर्ण कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए.... संपर्क - s.tiwariamu@gmail.com

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