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लेख का अंश… श्रम का जीवन में महत्व है। इस तथ्य को कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। क्षमताएँ, ज्ञान और रचनात्मकिा का मेल जब श्रम के साथ होता है, तब सफलता की नई इबारत लिखी जाती है। लोकप्रियता बढ़ने लगती है और सामाजिक स्वीकार्यता में वृद्धि होती है। मन, वाणी और कर्म में शुचिता रखनेवाला कर्मयोगी सिर्फ स्वजनों में ही नहीं अपितु गैरों में भी स्नेह पाता है। किसी भी श्रमजीवी या कर्मयोगी को कोई भी कार्य करने से पहले सिर्फ अपनी खुशी देखनी चाहिए। यदि हम परोपकार भी करना चाहते हैं, तो भी पहले अपनी खुशी देखनी चाहिए। कभी –कभी ये सुनने में अजीब लगता है कि स्वार्थी होकर खुद की खुशी के लिए कार्य क्यों करना चाहिए? ये कितना उचित है? श्रमजीवी व्यक्ति को तो त्यागी पुरुष होना चाहिए। किंतु ऐसा त्याग बाहरी तत्वों और आवरण के द्वारा ही संभव है और मेरा व्यक्तिगत विचार है कि हर वो त्याग जो बाहरी है और जो खुशी नहीं देता हे, वो सिर्फ खुद के साथ छलावा है। छलावा कभी भी देर तक अपना अस्तित्व बरकरार नहीं रख सकता। यदि हम स्वयं को खुश रखने में कामयाब हो पाएँ तो हम अपने आसपास के और साथी मित्रों को भी खुशी दे पाएँगे। इस प्रकार ये खुशी एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे तक स्वत: प्रवाहित होती चली जाएगी। जब लोग कहते हैं कि हमें दूसरों की खुशी के लिए श्रम करना चाहिए तब मुझे थोड़ी आपत्ति होती है। ऐसा श्रम जो खुद को संतुष्टि नहीं दे पाए वो ज्यादा समय के लिए फलदायी नहीं हो सकता। ऐसे में परोपकार भी देर तक जारी नहीं रह सकता। प्रेरणा का स्रोत हमारे भीतर विद्यमान है। ज्ञान का संवर्धन अन्तर्मन से प्रस्फुटित होता है। बाह्य आवरण के द्वारा किया गया श्रम सिर्फ जीविका का साधन तो उपलब्ध करा सकता है, सफलता की ऊँचाइयों पर नहीं पहुँच सकता। वाणी, मन, इंद्रियों की पवित्रता और एक दयालु हृदय के द्वारा किया गया श्रम सफलता तक न पहुँचे, ऐसा मुमकिन ही नहीं है। इस अधूरे लेख का पूरा आनंद लेने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए….

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